सीखें
कालपत्र हर दिन आकाश की एक बात सिखाता है — वही जो उस दिन ऊपर हो रहा है। शब्द पर उँगली रखिए, वह खुद समझाता है।
पिछली सीखें
शब्दावली
समय की इकाइयाँ
- तिथि
- चाँद हर दिन सूरज से करीब 12° आगे खिसक जाता है। उतनी दूरी एक तिथि है, इसलिए अमावस्या से अमावस्या तक 30 तिथियाँ बनती हैं। तिथि का समय तारीख़ से नहीं, चाँद की चाल से तय होता है, इसलिए वह दिन के बीच में भी बदल सकती है।
- देखिए: आज की तिथि कब बदलती है, वह समय हाशिये में लिखा है। उस समय चाँद ठीक 12° की अगली सीढ़ी पार करता है।
- पक्ष
- महीने के दो आधे। अमावस्या के बाद चाँद रोज़ बढ़ता है — यह शुक्ल पक्ष है, उजला आधा। पूर्णिमा के बाद घटता है — कृष्ण पक्ष, अँधेरा आधा। हर पक्ष में पंद्रह तिथियाँ।
- देखिए: आज शाम चाँद देखिए: अगर दाहिनी ओर से उजला है और रोज़ मोटा हो रहा है तो शुक्ल पक्ष चल रहा है।
- नन्दा-भद्रा-जया-रिक्ता-पूर्णा
- पंद्रह तिथियाँ पाँच-पाँच के क्रम में दोहराती हैं: 1, 6, 11 नन्दा; 2, 7, 12 भद्रा; 3, 8, 13 जया; 4, 9, 14 रिक्ता; 5, 10, 15 पूर्णा। पुराने मुहूर्त-ग्रंथ हर समूह को एक तरह के काम से जोड़ते हैं — रिक्ता पर नया आरम्भ टाला जाता है, पूर्णा पर काम पूरे किए जाते हैं।
- देखिए: आज की तिथि को 5 से भाग दीजिए — बचा हुआ अंक बताता है कि वह किस समूह की है।
- योग (पंचांग का)
- सूरज और चाँद की दूरियाँ जोड़कर जो अंक आता है, उसे 27 हिस्सों में बाँटने से योग बनता है। यह पंचांग का पाँचवाँ अंग है; नाम जैसे सिद्धि, शुभ, व्यतीपात। कुंडली के "योग" इससे अलग चीज़ हैं।
- देखिए: पूरे पंचांग में "योग" की पंक्ति देखिए: उसका बदलने का समय भी लिखा है।
- करण
- आधी तिथि एक करण है — चाँद का 6° आगे बढ़ना। दिन में दो करण होते हैं। ग्यारह नाम हैं; उनमें "विष्टि" वही है जिसे भद्रा कहते हैं।
- देखिए: पूरे पंचांग में करण की पंक्ति देखिए; अगर "विष्टि" लिखा है तो वही भद्रा है।
- वार
- सात वार सात ग्रहों के नाम पर हैं: रवि, सोम (चाँद), मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि। पंचांग का दिन आधी रात से नहीं, सूर्योदय से शुरू होता है — इसलिए भोर चार बजे अभी पिछला वार ही चल रहा होता है।
- देखिए: सूर्योदय का समय हाशिये में है; उससे पहले पैदा हुए बच्चे का वार पिछला गिना जाता है।
- मास
- चाँद का एक पूरा चक्कर एक मास है, लगभग साढ़े उनतीस दिन। उत्तर भारत में मास पूर्णिमा पर पूरा होता है (पूर्णिमान्त), दक्षिण और पश्चिम में अमावस्या पर (अमान्त)। नाम उस नक्षत्र से है जिसमें पूर्णिमा का चाँद होता है — कार्तिक की पूर्णिमा कृत्तिका में।
- देखिए: हाशिये में पूर्णिमान्त और अमान्त दोनों नाम दिखते हैं; कृष्ण पक्ष में वे अलग होते हैं।
- अधिक मास
- बारह चान्द्र मास सौर वर्ष से करीब 11 दिन छोटे पड़ते हैं। हर 32–33 महीने में एक अतिरिक्त मास जोड़कर हिसाब बराबर किया जाता है — वह मास जिसमें सूरज राशि नहीं बदलता। इसी से त्योहार मौसम से बँधे रहते हैं।
- देखिए: कैलेंडर में महीने के नाम के आगे "(अधिक)" लिखा हो तो वही है।
- संवत
- वर्ष गिनने की परम्परा। विक्रम संवत ईसवी सन से 57 आगे चलता है और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया वर्ष गिनता है; शक संवत 78 पीछे। दोनों पंचांग में साथ लिखे जाते हैं।
- देखिए: दिन के शीर्षक के नीचे दोनों संवत लिखे हैं।
- ऋतु
- छह ऋतुएँ, हर एक दो सौर मासों की: वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर। वे सूरज की राशि से चलती हैं, इसलिए तारीख़ के हिसाब से हर साल लगभग एक ही समय आती हैं।
- देखिए: दिन के शीर्षक में ऋतु लिखी है; शरद पूर्णिमा का चाँद उसी ऋतु का है।
- एकादशी
- हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि — महीने में दो, साल में चौबीस, हर एक का अपना नाम (निर्जला, देवशयनी, देवउठनी…)। विष्णु का दिन; उपवास की सबसे पुरानी परम्पराओं में से एक। कभी-कभी गृहस्थ (स्मार्त) और वैष्णव इसे अलग दिन रखते हैं।
- देखिए: कैलेंडर में अगली एकादशी और उसका नाम देखिए।
- प्रदोष
- त्रयोदशी की शाम, सूर्यास्त के बाद के लगभग ढाई घंटे — शिव का समय। महीने में दो बार। "प्रदोष" का अर्थ ही है दिन और रात का सन्धि-काल।
- देखिए: हाशिये में सूर्यास्त का समय है; प्रदोष उससे शुरू होता है।
आकाश
- नक्षत्र
- चाँद आकाश का एक चक्कर लगभग 27 दिन में पूरा करता है। उस रास्ते को 27 बराबर हिस्सों में बाँटा गया है, हर हिस्से का नाम उसके तारों पर — यही नक्षत्र हैं। रोज़ चाँद एक नक्षत्र आगे बढ़ता है।
- देखिए: आज रात चाँद के पास जो तारे हैं, वही आज का नक्षत्र हैं। रोहिणी का लाल तारा और कृत्तिका का गुच्छा सबसे पहचानने लायक हैं।
- पद
- हर नक्षत्र चार बराबर पदों (चरणों) में बँटा है। चाँद एक पद लगभग छह घंटे में पार करता है। जन्म के समय चाँद जिस पद में था, उसी से नाम का पहला अक्षर आता है।
- देखिए: कुंडली के "नामाक्षर" में चार अक्षर हैं — एक-एक पद का एक।
- राशि (चन्द्र राशि)
- आकाश का वही रास्ता 12 बराबर हिस्सों में भी बँटा है — ये राशियाँ हैं, हर एक 30° की, सवा दो नक्षत्र जितनी। चाँद एक राशि में लगभग सवा दो दिन रहता है। भारतीय परम्परा में "आपकी राशि" जन्म के समय की चन्द्र राशि है, सूर्य राशि नहीं।
- देखिए: हाशिये में "चन्द्र … में" आज की राशि है; कुंडली पर अपनी जन्म-राशि से मिलाइए।
- सूर्य राशि
- सूरज एक राशि में करीब एक महीना रहता है। यहाँ राशियाँ तारों से नापी जाती हैं (निरयण), इसलिए अख़बार की पश्चिमी राशियों से लगभग 24° पीछे पड़ती हैं — उसी से "मकर संक्रांति" 14 जनवरी को आती है।
- देखिए: पूरे पंचांग में "सूर्य राशि" देखिए और अगली संक्रांति की तारीख़ कैलेंडर में।
- अयन
- साल के दो आधे, सूरज की चाल से। मकर संक्रांति से सूरज रोज़ थोड़ा उत्तर की ओर उगता है — उत्तरायण, दिन बढ़ते हैं। कर्क संक्रांति से दक्षिण की ओर — दक्षिणायन, दिन घटते हैं।
- देखिए: कुछ दिनों तक सूर्योदय का समय हाशिये में देखिए — वह रोज़ कुछ मिनट खिसकता है।
- संक्रांति
- सूरज का एक राशि से अगली में जाना — महीने में एक बार। मकर संक्रांति (14 जनवरी के आसपास) सबसे मनाई जाती है, मेष संक्रांति (बैसाखी) से सौर नववर्ष। तारीख़ लगभग तय रहती है क्योंकि यह सूरज की घटना है, चाँद की नहीं।
- देखिए: कैलेंडर में अगली संक्रांति; उस दिन सूर्य राशि बदलती है।
- ग्रहण
- जब पृथ्वी की छाया चाँद पर पड़े (चन्द्र ग्रहण, सिर्फ़ पूर्णिमा को) या चाँद सूरज के सामने आ जाए (सूर्य ग्रहण, सिर्फ़ अमावस्या को)। ऐसा हर महीने नहीं होता क्योंकि चाँद का रास्ता थोड़ा झुका है — जहाँ वह सूरज के रास्ते को काटता है, उन्हीं बिन्दुओं को राहु और केतु कहा गया।
- देखिए: कैलेंडर में ग्रहण लाल बिन्दु से चिह्नित है, समय के साथ।
दिन के मुहूर्त
- मुहूर्त
- दिन-रात के तीस हिस्से, हर एक लगभग 48 मिनट का — यह मुहूर्त की मूल नाप है। आम बोलचाल में "मुहूर्त" किसी काम के लिए चुना हुआ शुभ समय भी है।
- देखिए: ब्रह्म मुहूर्त और अभिजीत मुहूर्त — दोनों इसी नाप के हैं।
- अभिजीत मुहूर्त
- दिन का आठवाँ मुहूर्त, ठीक दोपहर के आसपास — जब सूरज सबसे ऊँचा होता है, लगभग 48 मिनट। परम्परा इसे ज़्यादातर कामों के लिए अच्छा मानती है; बुधवार को इसे छोड़ा जाता है।
- देखिए: हाशिये में "अभिजीत" के साथ आज का समय है; यह सूर्योदय-सूर्यास्त के ठीक बीच में पड़ता है।
- ब्रह्म मुहूर्त
- सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले का समय — रात का उनतीसवाँ मुहूर्त। अध्ययन, ध्यान और उठने के लिए सराहा गया समय।
- देखिए: पूरे पंचांग के शुभ समयों में इसका आज का समय है।
- राहुकाल
- सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय आठ बराबर हिस्सों में बाँटिए। हर वार का एक तय हिस्सा राहुकाल कहलाता है — सोमवार दूसरा, शनिवार तीसरा, शुक्रवार चौथा, बुधवार पाँचवाँ, गुरुवार छठा, मंगलवार सातवाँ, रविवार आठवाँ। परम्परा में इसमें नया काम शुरू नहीं करते; चलता काम रोकते नहीं।
- देखिए: इसीलिए राहुकाल हर हफ़्ते उसी क्रम में लौटता है; समय मौसम के साथ दिन की लम्बाई से बदलता है।
- यमगण्ड
- राहुकाल की तरह दिन का एक आठवाँ हिस्सा, वार से तय। परम्परा इसे भी नए आरम्भ के लिए टालती है।
- देखिए: पूरे पंचांग में "टालें" के नीचे इसका समय है।
- गुलिक काल
- दिन के आठ हिस्सों में से एक और, जिसे शनि से जोड़ा जाता है। दक्षिण भारत में इसे ज़्यादा देखा जाता है।
- देखिए: पूरे पंचांग में "टालें" के नीचे।
- चौघड़िया
- दिन के आठ और रात के आठ बराबर हिस्से, हर एक लगभग डेढ़ घंटे का ("चार घड़ी")। सात नाम घूमते हैं: उद्वेग, चर, लाभ, अमृत, काल, शुभ, रोग। अमृत, शुभ और लाभ को अच्छा, चर को ठीक, बाकी को टालने लायक माना जाता है।
- देखिए: योजना पृष्ठ पर पूरा दिन चौघड़ियों में बिछा है; हरे रंग के अच्छे हैं।
- होरा
- दिन के बारह और रात के बारह हिस्से, हर एक किसी ग्रह का। पहली होरा उसी ग्रह की होती है जिसका वार है। "घंटा" शब्द भी इसी होरा से निकला है।
- देखिए: पूरे पंचांग में "होरा" टैब देखिए।
- पंचक
- जब चाँद कुम्भ और मीन राशि में होता है — धनिष्ठा के उत्तरार्ध से रेवती तक, पाँच नक्षत्र, लगभग पाँच दिन। परम्परा में कुछ काम (जैसे छत डालना, दक्षिण की यात्रा) इन दिनों टाले जाते हैं।
- देखिए: हाशिये में "पंचक" आए तो चाँद उन्हीं तारों के पास है।
- भद्रा
- विष्टि करण का समय — हर आठवीं आधी-तिथि। लगभग छह-सात घंटे, महीने में आठ बार। रक्षाबंधन और होलिका दहन में इसे ख़ास तौर पर देखा जाता है।
- देखिए: हाशिये की "टालें" पंक्ति में इसका आज का समय है, जब पड़े।
कुंडली और आप
- तारा बल
- आज के नक्षत्र को अपने जन्म-नक्षत्र से गिनिए और नौ-नौ के चक्र में देखिए: जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र, अतिमित्र। सम्पत्, क्षेम, साधक, मित्र और अतिमित्र अनुकूल माने जाते हैं। यह दिन का एक पुराना, सरल हिसाब है — भविष्यवाणी नहीं।
- देखिए: हाशिये की "आपके लिए तारा" पंक्ति यही गिनती है।
- चन्द्र बल
- आज चाँद आपकी जन्म-राशि से कौन-सी राशि में है — पहली, तीसरी, छठी, सातवीं, दसवीं, ग्यारहवीं को अनुकूल गिना जाता है। चाँद सवा दो दिन में राशि बदलता है, इसलिए यह हर दो-तीन दिन में बदलता है।
- देखिए: हाशिये में "चन्द्र बल … भाव" के साथ।
- चन्द्राष्टम
- जब चाँद आपकी जन्म-राशि से आठवीं राशि में होता है — महीने में एक बार, लगभग सवा दो दिन। परम्परा में इन घंटों में नया काम शुरू करने से बचा जाता है। यह रुककर सोचने का समय है, डरने का नहीं।
- देखिए: हाशिये में चन्द्राष्टम के घंटे लिखे होते हैं, जब पड़े।
- जन्मतिथि (तिथि के अनुसार जन्मदिन)
- जिस मास और तिथि को आप जन्मे, वही अगले साल जब लौटती है — वह जन्मतिथि है। तारीख़ हर साल कुछ दिन इधर-उधर पड़ती है क्योंकि चाँद का साल सूरज के साल से छोटा है। परम्परा में जन्मदिन इसी दिन मनाया जाता था।
- देखिए: कुंडली पृष्ठ पर इस साल की जन्मतिथि लिखी है; परिवार के सदस्यों की हाशिये में उस दिन आती है।
- लग्न
- जन्म के क्षण पूर्व क्षितिज पर जो राशि उग रही थी, वह लग्न है। यह लगभग हर दो घंटे में बदलता है, इसलिए जन्म का सही समय ज़रूरी है। कुंडली के बारह भाव इसी से गिने जाते हैं।
- देखिए: कुंडली के सारांश में "लग्न"; समय अनिश्चित हो तो सम्भावित लग्न दिखते हैं।
- दशा (विंशोत्तरी)
- जीवन को नौ ग्रहों की बारी में बाँटने की परम्परा — कुल 120 वर्ष, हर ग्रह की अपनी लम्बाई (शुक्र 20, शनि 19, बुध 17…)। शुरुआत जन्म के चाँद के नक्षत्र से तय होती है। हर महादशा के भीतर छोटी अंतर्दशाएँ उसी क्रम में चलती हैं।
- देखिए: कुंडली के "दशा" टैब में अभी चल रही दशा और उसका अंत देखिए।
- गण्डमूल
- छह नक्षत्र जहाँ राशि और नक्षत्र की सीमा साथ पड़ती है: अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती। इनमें जन्म पर परम्परा 27वें दिन (जब चाँद उसी नक्षत्र में लौटता है) एक शान्ति का विधान करती है। यह एक रिवाज़ है, भय का विषय नहीं।
- देखिए: बच्चे की कुंडली के "रिश्ता" कार्ड में यह लिखा है।